निगाहों में मंजिल थी गिरे और गिर कर संभलते रहे 👈👈👈

निगाहों में मंजिल थी गिरे
 और गिर कर संभलते रहे 
हवाओं ने बहुत कोशिश की लेकिन चिराग
आंधियों में भी चलते रहे !

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तो जिंदा हो तुम

पिघले नीलम से बहता हुआ यह समा, नीली नीली सी खामोशियां, ना कहीं है जमीन, ना कहीं आसमां, सरसराती हुई तेहनियां ,पत्तियां कह रही है बस एक तुम हो यहां सिर्फ में हूं मेरी सांसे है और मेरी धड़कने ऐसी गहराइयां ऐसी तनहाइयां और मैं सिर्फ में,अपने होने पर मुझको यकीन आ गया।